बहु समाज के लिए धर्म की आवश्यकता।

बहु समाज के लिए धर्म की आवश्यकता।

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बहु समाज के लिए धर्म की आवश्यकता।

समितियों को धर्म कि कितनी आवश्यकता है ?

अनैष्ट रेनान

फ्रेंच ऐतिहासकार
वो सुबूत जो स्वयं बताये
इसबात की संभावना है कि हर वह अंश जिस से हम प्रेम करते हैं, वह नष्ट हो जाय, और यह भी संभावना कि बुध्दि, विज्ञान, और उद्योग के उपयोग की स्वतंत्रता समाप्त हो जाय। लेकिन यह असंभव है कि धार्मिकता मिठ जाय बल्कि यह ऐसे भैतिकवाद के गलत होने पर स्वयं सुबूत है जो मानव को स्थलीय जीवन के अमूल्य मार्ग के अंतर्गत बाँध रखे

जब मनुष्य के लिए धर्म एक आवश्यकता है, तो बहु समाज के लिए धर्म की आवश्यकता अधिक हो जायेगी, क्योंकि धर्म समाज के लिए रक्षक है, इसलिए कि मानव जीवन आपस में उसके सदस्यों के बीच भले कार्यां में सहयोग के बिना पूरा नही हो सकता है। और (देखो) नेकी और परहेज़गारी के कामों में एक दूसरे की मदद किया करों और गुनाह और जूल्म की बातों में मदद न किया करो। (अल माइदा, 2)

और आपसी यह मदद केवल उसी प्रणाली संभव है जो संबंधों को नियन्त्रित करे, कर्तव्यों को परिभाषित करे और अधिकारों को सुनिश्चत रखे।

फिलिप हित्ती

लेबनान ऐतिहासकार
सच्ची शरियत
इसलामी शरियत धार्मिक और संसारिक के बीच कोई अंतर नही रखती। बल्कि वह तो अल्लाह के साथ मनुष्यके रिश्ते को, और अल्लाह के ओर मनुष्य के कर्तव्य को बताती है, और इन रिश्तों को व्यवस्थित करती है, जैसा कि इसलामी शरियत मनुष्यों का दूसरे मनुष्यं से रिश्ता जोडती है। अल्लाह के सारे आदेश और रोक जो धार्मिक, सामाजिक और इसके अलावा जिस किसी भी चीज़ से संबंधित हो वह सबके सब क़ुरआन में मौजूद हैं। जिस मे से लग भग 6000 या इससे कुछ अधिक आयतें हैं। जिसमे से लगभग 1000 आयतें विधान से संबंधित हैं।

और इस प्रकार के प्रणाली का किसी ऐसे विशेषज्ञ की ओर से होना ज़रुरी है जो मानवता की आवश्यकताओं का ज्ञान रखता हो भला जिस ने पैदा किया, वह बे-ख़बर है? वह तो छिपी बातों का जानने वाला और (हर चीज़ से) आगाह है।(अल मुल्क, 14)

जैसे जैसे मानवता, धर्म, धार्मिक नियम और उसके वुसूलों से दूर होते गए, उसी प्रकार से वह शक, गुमराही, अप्रसन्नता, भ्रम और नष्ट में डूबते गए।

समाज के स्थिर और एक जुट रहने पर धार्मिकता का प्रभाव

थामस अरनाल्ड

ब्रिटिश प्राच्य विद्या विशारद
धर्म में व्यक्तिगत इच्छा का कोई स्थान नही
मदीना मुनव्वरा में मोहम्मद सल्ललाहु अलैही व सल्लम का जो गरम जोशी से स्वगत किया गया, इसके कारणों में से एक कारण हमारे मत यह है कि मदीना मुनव्वरा के ज्ञानीवानों के लिए इसलाम में प्रवेश होना अपने समाज कि अराजकता का उपचार था। क्यों कि, इन ज्ञानी लोगों ने ये देखा कि इसलाम ने एक मज़बूत संगठन, और मनुष्य के बोलगाम इच्छाओं को ऐसे दृढ़ शासनों के आगे नत मस्तक करदिया, जो कि एसे प्रमुख शक्तित वाली शरियत के ओर से लागु किये गये है जो व्यक्तिक इच्छाओं पर अतिक्रमण है।

और पृथ्वी के चारों ओर कोई शक्ति नही है जो प्रणाली के सम्मान को सुनिश्चित रखने, सामुदायिक सामंजस्य और उसके नियमों की स्थिरता बाकी रखने और सामाजिक सुख और आराम के कारण प्रावधान करने मे धार्मिकता की शक्ति के समान हो। और इसका रहस्य यह है कि मनुष्य सारे प्राणियों में अपने गतिविधियाँ और कार्यां मे वैकल्पिक है, जिसका कंट्रोल ऐसी उध्दश्य शक्ति करती है जिसको न कान सुन सकते है और न आँख देख सकते है, वह शक्ति विश्वास (ईमान) है, जो आत्मा को साफ करती है, शारीरिक अंगों को नियमित बनाती है और मनुष्य को अपने बाह्य के समान अपने आंतरिक के भी ध्यान रखने पर मजबूर करती है और अगर तुम पुकार कर बात कहो तो वह तो छिपे भेद और बहुत छिपी बात तक को जानता है। (ताहा, 7)

फोल्टेर

फ्रेंच दार्शनिक
आप लोगों की बुध्दि कहाँ चले गयी
आप लोग अल्लाह की उपस्थिती में शंका क्यों करते हो। अन्यथा अल्लाह ना होता तो मेरी बीवी मेरे साथ विश्वासघात करती। और मेरा सेवक मुझे चुरालेजाता।

परन्तु मनुष्य सदा सही सिध्दांत या ग़लत सिध्दांत से जुडा होता है, जब उसका सिध्दांत सही हो, तो उसकी हर चीज़ सही हो जाती है, और जब सिध्दांत ही ग़लत हो तो हर चीज़ उसकी ग़लत हो जाती है।

इसी कारण न्याय और इंसाफ के नियमों के अनुसार लोगों के बीच व्यवहार को फैलाने मे धर्म ही सब से अधिक सुनिश्चित है, और इसी कारण धर्म एक सामाजिक आवश्यकता है। परन्तु अगर धर्म बहु समाज के अंदर मानसिक शरीर में दिल के समान हो जाये तो कोई हैरत की बात नही।

और जब साधारण रुप से धर्म का यह स्थान है, और आज कल हमारे इस संसार मे कई धर्म और जात हैं, इसी प्रकार से हम यह देखते हैं कि हर जात को अपने धर्म से प्रेम है और वह उससे खुश भी हैं। तो वह कौन-सा सही धर्म है जो मानवता के लिए सही चीज़ों का उपदेश देता है? और सही धर्म के नियम क्या हैं?





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