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बेशक अहले किताब और मुशरेकीन से जो लोग (अब तक) काफ़िर हैं वह दोज़ख़ की आग में (होंगे) हमेशा उसी में रहेंगे यही लोग बदतरीन ख़लाएक़ हैं

बेशक जो लोग ईमान लाए और अच्छे काम करते रहे यही लोग बेहतरीन ख़लाएक़ हैं

उनकी जज़ा उनके परवरदिगार के यहाँ हमेशा रहने (सहने) के बाग़ हैं जिनके नीचे नहरें जारी हैं और वह आबादुल आबाद हमेशा उसी में रहेंगे ख़ुदा उनसे राज़ी और वह ख़ुदा से ख़ुश ये (जज़ा) ख़ास उस शख़्श की है जो अपने परवरदिगार से डरे

जब ज़मीन बड़े ज़ोरों के साथ ज़लज़ले में आ जाएगी

और ज़मीन अपने अन्दर के बोझे (मादनयात मुर्दे वग़ैरह) निकाल डालेगी

और एक इन्सान कहेगा कि उसको क्या हो गया है

उस रोज़ वह अपने सब हालात बयान कर देगी

क्योंकि तुम्हारे परवरदिगार ने उसको हुक्म दिया होगा

उस दिन लोग गिरोह गिरोह (अपनी कब्रों से) निकलेंगे ताकि अपने आमाल को देखे

तो जिस शख्स ने ज़र्रा बराबर नेकी की वह उसे देख लेगा

और जिस शख्स ने ज़र्रा बराबर बदी की है तो उसे देख लेगा

(ग़ाज़ियों के) सरपट दौड़ने वाले घोड़ो की क़सम

जो नथनों से फ़रराटे लेते हैं

फिर पत्थर पर टाप मारकर चिंगारियाँ निकालते हैं फिर सुबह को छापा मारते हैं

(तो दौड़ धूप से) बुलन्द कर देते हैं

फिर उस वक्त (दुश्मन के) दिल में घुस जाते हैं