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तारे की क़सम जब टूटा

कि तुम्हारे रफ़ीक़ (मोहम्मद) न गुमराह हुए और न बहके

और वह तो अपनी नफ़सियानी ख्वाहिश से कुछ भी नहीं कहते

ये तो बस वही है जो भेजी जाती है

इनको निहायत ताक़तवर (फ़रिश्ते जिबरील) ने तालीम दी है

जो बड़ा ज़बरदस्त है और जब ये (आसमान के) ऊँचे (मुशरक़ो) किनारे पर था तो वह अपनी (असली सूरत में) सीधा खड़ा हुआ

फिर करीब हो (और आगे) बढ़ा

(फिर जिबरील व मोहम्मद में) दो कमान का फ़ासला रह गया

बल्कि इससे भी क़रीब था

ख़ुदा ने अपने बन्दे की तरफ जो 'वही' भेजी सो भेजी

तो जो कुछ उन्होने देखा उनके दिल ने झूठ न जाना

तो क्या वह (रसूल) जो कुछ देखता है तुम लोग उसमें झगड़ते हो

और उन्होने तो उस (जिबरील) को एक बार (शबे मेराज) और देखा है

सिदरतुल मुनतहा के नज़दीक

उसी के पास तो रहने की बेहिश्त है

जब छा रहा था सिदरा पर जो छा रहा था

(उस वक्त भी) उनकी ऑंख न तो और तरफ़ माएल हुई और न हद से आगे बढ़ी

और उन्होने यक़ीनन अपने परवरदिगार (की क़ुदरत) की बड़ी बड़ी निशानियाँ देखीं

तो भला तुम लोगों ने लात व उज्ज़ा और तीसरे पिछले मनात को देखा

(भला ये ख़ुदा हो सकते हैं)

क्या तुम्हारे तो बेटे हैं और उसके लिए बेटियाँ

ये तो बहुत बेइन्साफ़ी की तक़सीम है

ये तो बस सिर्फ नाम ही नाम है जो तुमने और तुम्हारे बाप दादाओं ने गढ़ लिए हैं, ख़ुदा ने तो इसकी कोई सनद नाज़िल नहीं की ये लोग तो बस अटकल और अपनी नफ़सानी ख्वाहिश के पीछे चल रहे हैं हालॉकि उनके पास उनके परवरदिगार की तरफ से हिदायत भी आ चुकी है

क्या जिस चीज़ की इन्सान तमन्ना करे वह उसे ज़रूर मिलती है

आख़ेरत और दुनिया तो ख़ास ख़ुदा ही के एख्तेयार में हैं

और आसमानों में बहुत से फरिश्ते हैं जिनकी सिफ़ारिश कुछ भी काम न आती, मगर ख़ुदा जिसके लिए चाहे इजाज़त दे दे और पसन्द करे उसके बाद (सिफ़ारिश कर सकते हैं)