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मगर (लोगों) हक़ तो ये है कि तुम लोग दुनिया को दोस्त रखते हो

और आख़ेरत को छोड़े बैठे हो

उस रोज़ बहुत से चेहरे तो तरो ताज़ा बशबाब होंगे

(और) अपने परवरदिगार (की नेअमत) को देख रहे होंगे

और बहुतेरे मुँह उस दिन उदास होंगे

समझ रहें हैं कि उन पर मुसीबत पड़ने वाली है कि कमर तोड़ देगी

सुन लो जब जान (बदन से खिंच के) हँसली तक आ पहुँचेगी

और कहा जाएगा कि (इस वक्त) क़ोई झाड़ फूँक करने वाला है

और मरने वाले ने समझा कि अब (सबसे) जुदाई है

और (मौत की तकलीफ़ से) पिन्डली से पिन्डली लिपट जाएगी

उस दिन तुमको अपने परवरदिगार की बारगाह में चलना है

तो उसने (ग़फलत में) न (कलामे ख़ुदा की) तसदीक़ की न नमाज़ पढ़ी

मगर झुठलाया और (ईमान से) मुँह फेरा

अपने घर की तरफ इतराता हुआ चला

अफसोस है तुझ पर फिर अफसोस है फिर तुफ़ है

तुझ पर फिर तुफ़ है

क्या इन्सान ये समझता है कि वह यूँ ही छोड़ दिया जाएगा

क्या वह (इब्तेदन) मनी का एक क़तरा न था जो रहम में डाली जाती है

फिर लोथड़ा हुआ फिर ख़ुदा ने उसे बनाया

फिर उसे दुरूस्त किया फिर उसकी दो किस्में बनायीं (एक) मर्द और (एक) औरत

क्या इस पर क़ादिर नहीं कि (क़यामत में) मुर्दों को ज़िन्दा कर दे

बेशक इन्सान पर एक ऐसा वक्त अा चुका है कि वह कोई चीज़ क़ाबिले ज़िक्र न था

हमने इन्सान को मख़लूत नुत्फे से पैदा किया कि उसे आज़माये तो हमने उसे सुनता देखता बनाया

और उसको रास्ता भी दिखा दिया (अब वह) ख्वाह शुक्र गुज़ार हो ख्वाह नाशुक्रा

हमने काफ़िरों के ज़ंजीरे, तौक और दहकती हुई आग तैयार कर रखी है

बेशक नेकोकार लोग शराब के वह सागर पियेंगे जिसमें काफूर की आमेज़िश होगी ये एक चश्मा है जिसमें से ख़ुदा के (ख़ास) बन्दे पियेंगे