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और उस दिन जहन्नुम सामने कर दी जाएगी उस दिन इन्सान चौंकेगा मगर अब चौंकना कहाँ (फ़ायदा देगा)

(उस वक्त) क़हेगा कि काश मैने अपनी (इस) ज़िन्दगी के वास्ते कुछ पहले भेजा होता

तो उस दिन ख़ुदा ऐसा अज़ाब करेगा कि किसी ने वैसा अज़ाब न किया होगा

और न कोई उसके जकड़ने की तरह जकड़ेगा

(और कुछ लोगों से कहेगा) ऐ इत्मेनान पाने वाली जान

अपने परवरदिगार की तरफ़ चल तू उससे ख़ुश वह तुझ से राज़ी

तो मेरे (ख़ास) बन्दों में शामिल हो जा

और मेरे बेहिश्त में दाख़िल हो जा

मुझे इस शहर (मक्का) की कसम

और तुम इसी शहर में तो रहते हो

और (तुम्हारे) बाप (आदम) और उसकी औलाद की क़सम

हमने इन्सान को मशक्क़त में (रहने वाला) पैदा किया है

क्या वह ये समझता है कि उस पर कोई काबू न पा सकेगा

वह कहता है कि मैने अलग़ारों माल उड़ा दिया

क्या वह ये ख्याल रखता है कि उसको किसी ने देखा ही नहीं

क्या हमने उसे दोनों ऑंखें और ज़बान

और दोनों लब नहीं दिए (ज़रूर दिए)

और उसको (अच्छी बुरी) दोनों राहें भी दिखा दीं

फिर वह घाटी पर से होकर (क्यों) नहीं गुज़रा

और तुमको क्या मालूम कि घाटी क्या है

किसी (की) गर्दन का (गुलामी या कर्ज से) छुड़ाना

या भूख के दिन रिश्तेदार यतीम या ख़ाकसार

मोहताज को

खाना खिलाना

फिर तो उन लोगों में (शामिल) हो जाता जो ईमान लाए और सब्र की नसीहत और तरस खाने की वसीयत करते रहे

यही लोग ख़ुश नसीब हैं